चांद पर सबसे पहले पहुचे थे भारतीय , कोई शक ?

ये देखिये नासा द्वारा जारी चित्र जिसमे नील खडे है चांद की धरती पर , और उनके बगल मे चित्र मे दिखाई देती परछाई को .. यही चित्र दिखाया था ना दुनिया को अमेरिका ने ..

 

१

ये आपको दिखाया गया आधा कटा हुआ चित्र , अगर अमेरिका इस चित्र को पूरा ही दिखा देता तो आपको पता चलता की ये साईड मे पढ रही परछाई किसकी है ? कौन है यहा जो पहले से ही मौजूद है ?.कौन है जो इन अमेरिकीयो का स्वागत कर रहा है चांद पर ? ये वही हो सकता है चांद पर पहले से ही मौजूद हॊ , तो लीजीये पेश है पहली बार दुनिया के सामने अमेरिका का असली चेहरा .और उस की फ़ोटो जो मौजूद था नील का स्वागत करने के लिये चांद पर  .

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.हम आपको बतायेगे की वो परछाई किसकी है ?

.कौन है वो ?

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.क्या कर रहा है वो ?

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.थोडा सा धर्य रखिये जी आप आज देख रहे है दुनिया के सबसे बडे झूठ का खुलासा वो भी केवल इसी ब्लोग पर

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२

 

अब उम्मीद है आपको कोई शक नही रह गया होगा , "सबसे आगे होते है हिंदुस्तानी "

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हम देश निर्पेक्ष भी है जी

आज फ़िर मन उदास है कल एक जाबाज जवान ( जी हा सैम जैसे लोग कभी बूढे नही होते) जीवन की लडाई मे शहीद हो गया . वो कोई नेता नही था अभिनेता नही था. एक मुंह्फ़ट सीधे सपाट शब्दो को कहने वाला और भारत का भला सोचने वाले इंसान था. देश को सम्मान दिलाने वाला एक योद्धा ,काफ़ी दिनो से बीमार था , कही कोई खबर नही ना चैनलो मे ना अखबार मे . अगर कही कोई नेता उन्हे देखने जाते तो खबर होती , अमिताभ , शाहरुख या एशवर्या को जुकाम होता तो खबर होती , राजकुमार कही घूमने निकलते तो खबर होती ,कोई हिरोईन किसी के साथ घूमने जाती या बतियाती  दिख जाती तो खबर होती. उनकी क्याकहे ब्लोगजगत पर धडाधड पोस्ट आ रही होती . लगता जैसे देश मे भूकंप आ गया है.

कल पूरे दिन मै लगातार ब्लोग देखता रहा , लेकिन सही बात यही है कि लोगो ने टिपियाने तक से परहेज किया कि कही वो भारत की अस्मिता के साथ जुडे बंदे से जुडे हुये ना दिख जाये. एक श्रधांजली जैसे शब्द से जुडने से बचते रहे लोग. कही उनकी देश निर्पेक्षता खतरे मे ना आजाये. देश के नेताओ की बात तो समझ मे आती है कि वे इसलिये सैम बहादुर को देखने और मिलने नही गये , नाही उनकी मृत्यू पर कोई शोक संदेश दिया , वे पाकिस्तान युद्ध के हीरो थे और उनके इस कार्य से कही उनके मुस्लिम वोटर ना नाराज हो जाये. पर ब्लोगर्स मे भी यही डर . हंसी आती है मुझे उनकी समझ पर .

जरा जरा सी बात पर भूचाल लाने की तैयारी करते लोग जो बाकी ब्लोगजगत को अंधा बहरा कहने से नही चूकते जिन्हे गांजा पट्टी मे हुई जरा सी हलचल विचलित कर देती है. शायद उन लोको को जन्म से ही आखो मे दूरबीन लगी हुई मिली है तभी उन्हे पास का कुछ भी नजर नही आता.वरना उन्हे कश्मीर मे अमरनाथ शाईन बोर्ड को दी गई जमीन जो सिर्फ़ यात्रा के समय यात्रियो को रुकने और उनके लिये स्नानागार एंव शौचालय बनाने के लिये प्रयुक्त होनी थी पर इतना बडा बवाल ? कहा जा रहा है कि ये हिंदुओ को घाटी मे बसाने और मुस्लिमो को अल्पसंख्यक बनाने की चाल है , अब कोई सवाल नही उठ रहा ही चालिस एकड मे कितने हिंदु बस जायेगे जो सारे कशमीर के मुस्लिमो को अल्पसंख्यक कर देगे. लाखो की संख्या मे हिंदू कशमीर से बाहर कर दिये गये और किसी के कानो पर जूं तक नही रेंगी.

बात बात मे गुजरात की बात उठाने वाले अब मुंह पर पट्टी बांध कर कही बिल मे जा छुपे है मानवाधिकार कार्यकर्ता जो इस देश के अपराधियो के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते है पता नही कहा चले जाते है

जब कोई बंगलादेशी मुस्लिमो के आने से हिंदूओ के अल्पसंख्यक होने की बात करता है तो ये वोट के सौदागर सत्यता से आंख फ़ेर लेते है.

ब्लोगजगत भी लगता है वांमपंथी और मानवाधिकार कार्यकर्ताओ के ही कब्जे मे है, वर्ना इन मुद्दो को कोई तो उठाता, झडी लग जाती पोस्टो की , जब कही कुछ ऐसा हो जो मुस्लिमो या अन्य अल्प संख्यको के विरुद्ध हो , मै यह नही कहता वह सही है. पर क्या बाकियो का दर्द  दर्द नही है. वो इस देश का नागरिक नही है, उसे भी जीने का हक नही है. शायद इन्ही खामियो की वजह से हमारा २००० साल का गौरव पूर्ण गुलामी का इतिहास हम ढोने के लिये अभिशिप्त है और रहेगे.

कल एक खबर और थी सभी चैनलो पर प्रमुखता से. मुंबई मे जीसस क्राईस्ट की फ़ोटो से अचानक खून निकलने की . सभी महिमामंडित करने मे लगे थे. क्या है यह ? गणेश जी दूध पिये तो मजाक उडाईये आस्था का , वैज्ञानिक बुलाकर विवेचन कीजीये. लेकिनगर क्राईस्ट की फ़ोटो से खून बहता दिखाई दे तो भूल जाईये सभी बाते . बस महिमा मडित कीजिये की जीसस ने भारतियो को चंगाई देने के लिये खून बहाया इस बात से आंख बंद कर लीजिये कि चर्च कितना पैसा बहा रहा है भारत मे धर्म परिवर्तन के लिये कितने , किस तरह से अनपढ भारतियो को बेवकूफ़ बनाकर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है . अब अगर हम बोलेगे तो आप लोग भी यही कहोगे ना कि ये बोलता है. क्या बोले जी

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इकलौती लडाई जो हारी सैम बहादुर ने

सैम बहादुर यानी भारत के पहले  फ़ील्ड मार्शल पद्म विभूषण ९४ वर्षीय सैम( सैम होर्मसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ) मानकेशा एक वास्तविक जननायक कल पहली बार हार गये.कल उन्होने इस जहा को अलविदा कह दिया. भारत ने अपना एक  बहादुर नायक खो दिया

भारत के पूर्व सेना प्रमुख और 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के हीरो माने जाने वाले फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का गुरुवार रात निधन हो गया. वो 94 वर्ष के थे.

कई दिनों से उनकी हालत नाज़ुक बनी हुई थी. मानेकशॉ तमिलनाडु के वेलिंग्टन सेना अस्पताल में भर्ती थे. यही एक इकलौती लडाई रही जो वे अपने जीवन मे हारे

समाचार एजेंसियों के अनुसार गुरुवार की सुबह डॉक्टरों ने कह दिया था उनकी हालत लगातार बिगड़ रही है.

भारत के सबसे ज़्यादा चर्चित और कुशल सैनिक कमांडर माने जाने वाले 95 वर्षीय मानेकशॉ का जीवन उपलब्धियों से भरा रहा. उन्होंने भारत के लिए कई महत्वपूर्ण जंगों में निर्णायक भूमिका निभाई.

उनकी सबसे बड़ी कामयाबी मानी जाती है - 1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग में जीत. उस समय पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में करीब 93 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों फ़ौज ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था.

तब से सैम बहादुर के नाम से लोकप्रिय फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ को एक राष्ट्रीय नायक के रूप में देखा जाता रहा है.

मानेकशॉ का बचपन

फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ का पूरा नाम सैम होर्मुशजी फ़्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ है. उनका जन्म तीन अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था.

उनका परिवार पारसी है. उनके पिता डॉक्टर एचएफ मानेकशॉ एक चिकित्सक थे और पंजाब में जाकर बस गए थे.

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सैम बहादुर का जो मज़ाकिया अंदाज़ है जो अपनापन है, उससे आपको इस बात का एहसास हो जाता है कि आप किसी हीरो के पास बैठे हुए हैं सैम मानेकशॉ ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में ही पाई. बाद में वो नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए.

स्कूली शिक्षा के बाद वो उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे. लेकिन उनके पिता ने उन्हें बहुत छोटा जानकर विदेश नहीं भेजा.

बाद में उन्होंने अमृतसर के हिंदू सभा कॉलेज में दाख़िला लिया. उन दिनों ‘ब्रिटिश इंडियन आर्मी’ में भारतीयों को सीधा कमीशन मिलने लगा था और देहरादून में ‘इंडियन मिलिट्री एकेडमी’ की स्थापना की गई थी.

सैम ने भी एकेडमी के पहले बैच में प्रवेश के लिए आवेदन किया और सफल हो गए.

मानेकशॉ पर डॉक्यूमेंट्री

फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ पर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘इन वार एंड पीस: द लाइफ़ ऑफ़ फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ’ भी बन चुकी है.

दिल्ली की ग़ैरसरकारी संस्था ‘परज़ोर’ ने इस डॉक्यूमेंट्री को तैयार किया था.

जनरल अरोड़ा और जनरल नियाज़ी - 1971 में

भारत-पाकिस्तान की 1971 की जंग के दौरान मानेकशॉ भारतीय सेनाध्यक्ष थे

ये फ़िल्म एक दादा द्वारा अपने पोते को बताए गए किस्सों पर आधारित थी. जिसमें दादा सैम मानेकशॉ ने अपने पोते को भारत के कुछ यादगार ऐतिहासिक पलों के बारे में बताया था.

फ़िल्म की निर्देशक जेसिका गुप्ता ने वर्ष 2003 में डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के उदघाटन समारोह के दौरान बीबीसी को बताया था, “सैम बहादुर का जो मज़ाक करने का अंदाज़ है, जो अपनापन है, उससे आपको इस बात का एहसास हो जाता है कि आप किसी हीरो के पास बैठे हुए हैं.”

इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में एक जगह सैम याद करते हैं कि कैसे 1971 की लड़ाई के बाद तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें तलब किया और कहा कि ऐसी चर्चा है कि सैम तख़्ता पलटने वाले हैं.

सैम ने मज़ाक करते हुए अपने जाने-माने अंदाज़ में कहा, “क्या आप ये नहीं समझतीं कि मैं आपका सही उत्तराधिकारी साबित हो सकूँगा? क्योंकि आपकी नाक लंबी है और मेरी भी नाक लंबी ही है.”

और फिर सैम ने कहा, “लेकिन मैं अपनी नाक किसी के मामले में नहीं डालता और सियासत से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है.”

फिल्म में सैम को ये भी कहते हुए दिखाया गया है कि शिमला समझौते के दौरान भारत ने कश्मीर समस्या सुलझाने का सुनहरा मौक़ा ख़ो दिया.

बी बी सी न्यूज से साभार ये आप यहा भी देख सकते है, और

यहा भी  दुख की इस घडी मे  हमारी तमाम संवेदनाये मानकेशा परिवार के साथ है.

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आलोक पुराणिक जी का सम्मान

files हमारे  आपके सबके चहेते अगडम बगडम वाले हिंदी व्यंग विधा के ब्रंहांड मे सबसे महान व्यंगकार आलोक पुराणिक जी आज बाबा फ़रीदी के नगर फ़रीदाबाद पधारे . उन्होने कवि सम्मेलन को अपनी एंव अपने व्यंग की  महान उपस्थिती के कृतार्थ किया.

माफ़ कीजीये ये व्यंग कल सुबह उनकी पोस्ट पर ही आप लोग पढ पायेगे . इसलिये हम आपको यहा नही पढवा सकते , मोहल्ला कवि सम्मेलन समिती ने उन्हे एक शाल , पाच किलो आलू, पाच किलो टमाटर , एक किलो बासमती चावल एंव एक तोला घी देकर सम्मानित किया. उनके विषेश आग्रह पर गुप्ता जी ( पुलिस वाले) उन्हे गाजियाबाद तक छोडने गये (माल लूट ना लिया जाये). इसी खतरे को ध्यान मे रखकर उन्होने अपनी तथा अति अनुग्रह पूर्वक दिये गये सम्मान पोटली की फ़ोटो खिचवाने से परहेज किया . अत: हम क्षमा प्रार्थी है कि आपको आज के इस महान उत्सव की कोई छवी भी नही दिखा पायेगे. सिवाय उन्हे व्यंग पढते हुये दिखाने के अलावा .

अवद

डा. आलोक पुराणिक व्यंग और महगाई के परस्पर संबंधो की विवेचना करते हुये

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"प्रियतमे कुसु"

प्रियतमे कुसु

सस्नेह दुलार

अब मै तुम्हे क्या कहु, तुम्हारा स्नेह गर्भित दुलार मिश्रित ज्ञानात्‍मक, संवेदनात्‍मक, विवेचनात्‍मक,प्रत्रोत्तर प्राप्त हुआ.अब मै ये पत्र तुम्हे तुम्हारी सहेली के स्थान पर तुम्हारी पडोस वाली जमना भौजी से मिलेगा, उम्मीद है तुम प्रफ़ुल्लित होगी.

स बार तुम्हारी इच्छानुसार कोई शेर नही डाल रहा हू. पहले तुम देख लो भौजी पत्र पढती है या बिना पढे देती है.वैसे इसमे मेरी कोई गलती नही थी , तुम्हारी याद आते ही मेरे सामने तुम्हारे गुलाब की पंखुडी के सदॄश गंध सुवासित अधखुले होठ सामने आ जाते है और शेर खुद ब खुद लिख जाता है, तुमने खुद माना है कि तुम्हारी सहेलियो ने शेर डायरी मे नोट किया था . तो मेरी प्राण प्यारी कुसुम तुम्ही बताओ वो शेर गंदा कैसे हुआ .

डा दिल करता है मै तुम्हारे पास आऊ बैठू बात करू. तुम्हारी गोद मे सर रखकर लेटा हुआ तुम्हारी आखो से तुम्हारे दिल के भीतर झाकता हुआ . तुम मेरी बात सुनती हो फ़िर अचानक हस देती हो फ़िर अचानक चुप हो जाती हो.

तनी सी सोच मेरे मन मस्तिष्क से लेकर मेरू रज्जू तक एक सनसनी दौडा जाती है . कभी कभी इच्छा होती है तुम्हारी उंगलियां थामे  साथ लेकर किसी दोस्‍त के घर जाऊं,  हर बात पर खिलखिलाकर हंसूं, हंसता रहूं.. करीने और अदब से अपनी प्‍यारी कुसु को सड़क पार करवाऊं

तुमने लिखा था तुम मुझसे नाराज हो इसलिये जवाब नही दोगी. बस लिख कर रख लोगी. पोस्ट नही करोगी, जीवन की गलियों के कचर-मचर की इस जिजीविषा रहित मूर्तिमान गर्तलोक  मे तुम्हारी इन्ही अदाओ की अविरल अजस्‍त्र मस्त धारा पर तो हम बलिहारी है. मन मे इस वक्त तुम पर कितना प्यार आ रहा है  पर हम तुम्हे नही बतायेगे वरना तुम फ़िर बुरा मान जाओगी.

मने रामबीर जीजाजी से बात की है. पहले तो कहने लगे लल्ला क्या बात है बहुत जल्दी है तो चलो उठा लाते है यही फ़ेरे करवा देंगे.बस तुम सूट सिलवा दो. वो तो तुम जानती हो बतंगड बनाने मे बहुत हुशियार है. पर मान गये है कह रहे थे कि हम रामखिलवनवा से और हमारे बाबूजी से बतियायेगे . जो होगा तुम्हे बता देगे.मन तो हमारा भी कर रहा है कि तुम्हे भी जल्दी से बंबई ले जाये

गता है अभी कहीं तुम नजदीक से पुकार रही हो.. महीन, हल्‍की.. मैं कान गड़ाये सुनता हूं कि तुम अब पहुंच ही रही हो, कब पहुंच रही हो.. पहुंचा ही चाहती हो ? लेकिन पहुंचती नहीं. या पहुंचती भी होगी तो मुंहअंजोर में नये पत्‍तों की सरसराहट, या दस महीने के बच्‍चे की सी फुसफुसाहट के किसी ऐसे झिलमिल दुश्‍वारियों में पहुंचती होगी जिसे मैं अपनी चेतना में थाह नहीं पाता.. गुज़र गयी के अचंभे और गुज़रेगी ही अभी-कभी की भोली उम्‍मीद में अकबकया उंगलियों पर पल गिनता हूं.. एक-दो-तीन.. तीन-दो-एक.. झपकियों, उनींदे, अचकचाये क्षणों के खालीपने को खाली-खाली-से सुरों से सजाता तकता रहता हूं, लेकिन नहीं आती. क्‍या, कौन, कैसी आवाज़ का फ़रेब है जिसमें धड़कते नंगे दिल को तश्‍तरी पर सजाये, कनपटी पर कोई अफ्रीकी नगाड़ा सुनता मैं बैठा होता हूं कैसे सुनाऊ तुम्हे अपने दिल की कठफ़ोडवे की अमलतास के तने पर की जा रही लगातार चोटो जैसी धडकन ठक . ठक .. ठक… ठक …..

तुम्हे रिबन पसंद नही आया तो फ़ेक देना ,तुम्हारे लिये हम लायेगे  इंद्रधनुषी जगमगाते किल किल करते जैसे सुबह सवेरे सूर्य ने अपनी रशमियो से बिखेरे रंग या फ़िर मोर ने जैसे अपने पंखो को फ़ैलाकर रंगो की छटा बिखेरी हो ,जैसे रंगो से भरे रिबन.

 कुसुम रानी ये बताओ कि तुम हमे चिट्ठी भेजती हो की टेलेग्राम , या हमे सताती हो , परसो हम मेले मे जा रहे है लिख देती हो और चिट्ठी हमे चार दिन बाद मिलती है. नही बुलाना था तो काहे लिख मारा. हम भी चिट्ठी मिलने के तीसरे दिन जैतपुर का टिकट कटाय पहुच गये तब पता चला कि मेला तो चार दिन पहले ही खत्म हो गया था.मेरे सपने ऐसे बिखरे जैसे सोवियत संघ  विघटन के बाद क्‍यूबा, दक्षिणी कोरिया, वेनेज़ुएला व बोलिविया मे .

तुम ये छुटकी भौजाई की चिरकुट बाते मत सुना करो . हम बंबई अखबार मे नौकरी करने जा रहे है कोई फ़िलम मे हीरो बनने नही जा रहे . हीरो तो बस हम तुम्हारे ही बनना चाहते है और तुम मेरी हिरोईन कुसुम.

अच्छा अब हम भी चिट्ठी स्माप्त करते है ,तुम्हे भी स्वीट स्वीट ….ढेर सारा प्यार

लो इस बार तुम ये महाकवि सिकोनोविच की कविता सुनो जो उन्होने अपनी चेक प्रियतमा के अलास्का भ्रमण पर कुत्सोव यकूतीहामा देरजोसिक को सुनाई थी.

गोभी का फ़ूल सर्द था

सूख गई है पीली पत्ती

रने मे पडी

द्दू की बेल

म्बे से बंधे

धे के बच्चे

र ऐसे मे

तुम्हारी याद

तुम्हारा एक अकिंचन

’प्रदीप श्रीवास्तव”

26 अगस्त 1974

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पुत्र का पत्र पिता के नाम

धन्यवाद जी आप सभी लोगो का कि आपने कबाडे मे मिले पत्र को इतना पंसंद किया ..उम्मीद है आपको बाकी भी पसंद आयेगे  वैसे पता  नही क्यो हम भारतीयो को कबाड से कुछ ज्यादा ही प्यार होता है. शायद इसी लिये हम भी रोज सुबह कबाडियो को पढने के लिये  कबाडखाने पहुच जाते है.

तो लीजीये इसी क्रम मे पेश है एक पुत्र का पत्र पिता के नाम . जो शायद उसने होस्टल से भेजा था. पत्र कई बार पढकर विदित हुआ लडका भी बाकी भारतीयो की तरह अग्रेजी से खास मोहब्ब्त करता था और नये नये अग्रेजी के शब्द सीखने की कोशिश कर रहा था. इस पत्र मे कई बार वह अग्रेजी के प्रयुक्त शब्दो मे कुछ गलतिया कर गया है  कृपया इसे अन्यथा ना ले.

पूज्यनीय पिताजी

सेवा मे सादर चरण स्पर्श

मै यहा भली प्रकार से रहते हुये आप सब के सुखी होने की कामना करता हू.मेरी स्ट्डी ठीक चल रही है. आपके भेजे पैसे मिल गये थे. मैने सभी बुक्स खरीद ली है. सभी टीचर बहुत अच्छे है. मेरा मन लग गया है आप चिंता ना करे .रूम मेट भी बहुत अच्छा है

पिताजी यहा अभी से काफ़ी कोल्ड पडनी शुरू हो गई है,अत: मुझे वाईफ़ की अति आवशयक्ता है.मै घर से जो चादर लाया था, उससे अब काम नही चल रहा है. मेरी परेशानी को देखकर मेरे रूम मेट ,जब तक मेरी वाईफ़ आप भेज नही देते तब तक शेयर करने को मान गया है.अत: अभी मै अपने रूम मेट की वाईफ़ से काम चला रहा हू.

लेकिन इतनी सर्दी मे दो लोग कितने दिन एक वाईफ़ से काम चला सकते है. आशा है आप मेरी प्रोबलम समझ गये होंगे. कृप्या मेरे लिये एक वाईफ़ तुरंत तैयार करा कर भेजने का प्रबंध करे. अगर मेरे लिये नई वाईफ़ तैयार कराने मे वक्त ज्यादा लग रहा हो , तो आप भईया की वाईफ़ को ही भेज दे , मै साल उसी से काम चला लूंगा, मेरे लिये तैयार कराई गई नई वाईफ़ को भैया प्रयोग कर लेंगे. छुट्टियो मे आते समय मै भईया की वाईफ़ ले आऊंगा और अपनी ले जाऊंगा . बाकी सब ठीक है अम्मा और भैया को चरण स्पर्श के साथ

आपका बेटा

X#X@*X#

पुनश्च:- पिता जी कृपया वाईफ़ अतिशीघ्र भिजवाये. सरदी बढती जा रही है.

(कृपया नाम के पीछे ना पडे , जिनका पत्र है उनके अनुरोध पर नाम हटा दिया गया है, उन्ही के द्वारा यह पता चला कि रूम मेट की बताई रजाई की अग्रेजी उन्होने  राईफ़ के बजाय वाईफ़ सुन लिया था )

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मोहल्ले का कवि सम्मेलन भाग दो

 

बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने हमारी पहली रिपोर्ट को हाथो हाथ लिया,हमारा उत्साह बढाया ,हम भी उम्मीद जगी कि आने वाले वक्त मे कोई चैनल वाला भी इसे देखे और हमे हाथो हाथ ले.(आखिर हम उनके रिपोर्टरो से उन्निस थोडे ही है) पेशे खिदमत है मोहल्ले के कवि सम्मेलन कम मुशायरे का दूसरा भाग

लेकिन इस भाग मे हमारे पहले के भाग की रिकार्ड तोड सफ़लता को देख कर ब्लोगर्स बंधुओ के मंच कब्जा लिया था , फ़रीदाबाद से सिर्फ़ हमारे गुप्ताजी ( पुलिसिया दोस्त) को ही मौका मिल पाया

पहले नंबर पर ज्ञान जी इलाहाबादी का कलाम नोश फ़रमाये-

"श्रीमती जी हो या चीटी , पंगा मत ले  ज्ञान

यो घूरै वो काट ले, मुश्किल मे पड जाये जान"

 दिल्ली से अगडम जी

"विकट समस्या हो गई, विकट हुई महंगाई

जमाये रखिये खोमचा, हम भी आते भाई"

 दिल्ली से ही बगडम जी

"सुबह उठा, पोट्टी गया, नहाने मे बज गये बारह

तुम देखो ये पोस्ट मेरी मै होता हू नौ दौ ग्यारह"

मुंबई से अज दरक जी

"राऊरकेला से चला

मै पहुंचा मुंबई खंडकी

घूरन मै छौडू नही

बकरी की लेढी हो

या हो वो लडकी

दिन के देखे सपने मे

मै जा पहुचा  चीन

पतनशील साहित्य की

खूब बजाता बीन"

श्रीनिवास दिल्ली से 

"पत्रकारिता के खेल मे हम

मिश्री को बनादे टाटरी

गर मिल जाये

दलित अल्पसंख्यक की खबरे

समझो निकल गई लाटरी"

गुप्ताजी " लट्ठ" फ़रीदाबादी

"सफ़ेद सफ़ेद बादलो से

भरा हुआ आकाश

जैसे कफ़न ओढ कर

लेटी कोई लाश"

 

"ये थाना है ऐ दोस्त

बस इतना समझ लीजै

कुछ लेके आना है

कुछ देके जाना है"

 

"कहा है ऐ दोस्त तू

दिल मेरा है बेचैन

हफ़्ता पूरा खिच गया

नही खिची कोई चैन"

 

डाक्टर बैराग

"दिल जिगर गुर्दे से

जब तबियत हो नासाज

तुरंत बदल वाईये

हम है आपके पास"

 

"हमसे मिले बिना जीना

इसकी संभावनाये बेकार

तुरंत मिलो आ हमसे

जब हो टायफ़ाईड मलेरिया बुखार"

मसी जीवी दिल्ली से

"मै उलझा रहा कंटेंट मे

पर बात नही बन पाई

जब से बनाया अग्रेजी ब्लोग

डालर की बहार आई"

विस्फ़ोटी दिल्ली

क्म्यूनिटी ब्लोग ना बनाईये

इसकी सोच मे खोट

मै तो अकेला ही भला

करने को विस्फ़ोट

 

समीर कनाडा से

यारो मै कविता लिखू

या दू टिपियाने पर ध्यान

तुम बतलाना सोच कर

मै सोता चादर तान

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एक पुराना प्रेमपत्र

सुबह सुबह जब घंटी बजी तो हमने पाया की एक दस बारह साल का एक बालक बोरी उठाये खडा है. पूछने पर पता चला कि वह कबाड खरीदने के लिये आया हुआ है. हमने उसे बताया की मेरे भाई घर पर श्रीमती जी नही है ,बाद मे आना.

साहब मै उत्ती बडी चीजे नही खरीदता .अभी आप अखबार की रद्दी ही देदो,साहब सुबह से बोहनी नही हुई है.हालाकी ये हमारा कार्य क्षेत्र नही है. फ़िर भी हमे बालक की साफ़गोई पर तरस आ गया कि वो उत्ती बडी चीजे नही खरीदता और हमने जो अखबार पूरे घर भर मे फ़ैला रखे थे , उठा लाये.

जब वो तौल रहा था, तब उसकी बोरी मे से झाकते कुछ कागजो के बंडल पर मेरा ध्यान गया . मैने उठाकर पढना शुरू किया अब जो मजनून सामने आया तो पता चला की हमारे हाथ एक पुरातन सामग्री लग गई है  जिससे पता चलता है कि भारत देश मे पिछली शताब्दी मे पत्र लिखने का चलन था,वो भी शादी के बाद भी जारी रहता था. ब्लोगजगत मे वैसे भी आजकल दूसरो की डायरीया छापने का चलन जोरो पर है.लिहाजा हमे भी अगले कई हफ़्तो तक छापने का मसाला हाथ लग ही गया . तो लीजीये पेश है पहला प्रेमपत्र. मजा लीजीये आप भी राउर केला के प्रमोद और उनकी परिणीता कुसुम के पत्राचार का

प्रात: स्मर्णीय

प्रियतम प्रमोद जी

को कुसुम का चरण स्पर्श पहुचे

हमको आपका चिट्ठी मिला, लिफ़ाफ़ा फ़िर खुला हुआ था , हम आपको मना किये थे कि अगली बार कमला के पते पर चिट्ठी मत डालना या फ़िर प्यार वाली बात मत लिखना, और ऐसे तेरे होठो को चूम लू जैसे गंदे गंदे मोहब्ब्त वाले शेर तो बिलकुल मत लिखना. वो आपकी चिट्ठी को क्लास मे सबको पढवाये थी, मनीषा, रामदेई और कलावती ने तो अपनी डायरी मे भी लिख लिये.जाईये हम आपसे बहुत नाराज है, हम आपको आपकी चिट्ठी का जवाब भी नही देंगे.अब मन नही मान रहा तो लिख तो लिये है पर डाक मे नही डालेंगे.

मुरादाबाद से मझोले वाली चाची आई थी, अम्मा से कह रही थी कि अब के फ़ागुन की तारीख निकल रही है लेकिन अम्मा और बडी भौजाई अगहन से पहले तैयार नही हो रही, तुम्ही कुछ करो ना

हम तो कुछ बोल नही सकते. रामखिलावन जीजा से कहलवादो उनकी बात कोई नही टालेगा, रिश्ता भी तो वही कराये थे.

आप जो रिबन भेजे थे आज वही बांधे है,लेकिन ये वो वाला लाल नही है जो हम बताये थे,हम परसौ जैतपुर के मेले मे जा रहे है, तुम्हे कसम है इस बार बिल्कुल मत आना, पिछली बार छुटकी भौजी ने तुम्हे देख लिया था. कह रही थी कि इस बार अम्मा को बता देगी .हम चार बजे कासगंज वाले की नान खटाई की दुकान पर जायेगे. लेकिन तुम्हे मेरी कसम है जो आये.हम अकेले ही आयेगे.

तुम बंबई काहे जाना चाहते हो, हमे तो राऊर केला ही अच्छा लगता है.छुटकी भोजाई बता रही थी बंबई मे फ़िलम मे काम करना चाहते हो, तुमहे हमारी कसम है जो बंबई गये तो हमारा मरे का मुंह देखो, हम भी फ़िल्म देखे है और फ़िल्मी किताबे भी पढे है, हमे सब मालूम है कि वहा की लडकिया कैसी है.तुमे किसी ने फ़ंसा लिया तो हम कही के नही रहेगे. अब हम लिखना बंद करते है,रात के दो बजे है अम्मा चिल्ला रही है कि अब बत्ती बंद करके सो जाओ. बहुत पढाई हो गई.हम भी सोती है आपको भी वो क्या कहते है अंग्रेजी मे स्वीट ड्रीम्स , गुड नाईट और ढेर सारा नही हमे शरम आती है हम नही लिखेगे तुम समझ लेना

तुम्हारी और सिर्फ़ तुम्हारी

प्राणॊ की प्यारी

कुसुम

“चली जा मेरी चिट्ठी कबूतर की चाल

जाके सुनाना उन्हे मेरे दिल का हाल”

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मोहल्ले के कवि सम्मेलन की रिपोर्टिंग

ये मौसम वैसे तो बारिशो का है, ऐसे मे यू तो दादुर( मेंढक ) ही बोलते पाये जाते है , पर लगता है ग्लोबलाईजेशन के इस जमाने मे इस मौसम का कुछ गलत असर हो गया है. तभी तो दिल्ली से लेकर कनाडा तक शेरो शायरी का मौसम छाया हुआ है. हर कोई अपने अपने शेर सुनाये क्या झिलाये जा रहा है. कल इस सुनामी की एक लहर हमारे मोहल्ले तक भी पहुच गई. लिहाजा कम्यूनिटी सेंटर मे तुरंत फ़ुरंत एक कवि सम्मेलन कम मुशायरे का आयोजन किया गया . तो लीजीये पेश है इस कवि सम्मेलन की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट (ये सबसे पहले केवल और केवल हम ही आप तक पहुचा रहे है )

सबसे पहले इलियास रामपुरी के शेर का मौंजू गौर फ़रमाईये

"या इलाही दे लुगाई, बच्चे हो कई हजार

एक डिप्टी नौ कलेक्टर बाकी सब तहसीलदार"

और ये शेर सुनाया अनूप कानपुरी ने

"जिसे प्यार करते थे, वो समझदार निकली

हम दिल दे रहे थे, वो गुर्दे की खरीदार निकली"

ऐसे मे हमारे शेर सिंह अहलावत जी कहा पीछे रहने वाले थे, इनको पहले भी आप हमारे ब्लोग पर पढ चुके हो, वही जी पुलिस वाले दोस्त

"सुधर जा, सुधर जा

मत समझ खुद को सिंकंदर

दिल आ गया किसी दिन

तो करदेंगे तेरा एनकाऊंटर"

 

"खुदी को कर बलंद इतना

कि हर चालान से पहले

बंदा तुझ से खुद पूछे

बता तेरी जेब कंहा है "

 

"खुद ब खुद जुड जाती है

कडी से कडी

जब हम दिखाते है

बंदे को हत्कडी  "

ऐसे मे चक्रबोरती साहब को भी जोश आ गया उन्होने

"न गिला करत हू ना शिकवा करता हू

तुम सलामत रहो, यही दुआ करता हू"

को कुछ यू सुनाया अपने अंदाज मे.

"ना शूको कोरता है , ना गीलो कोरता है

तुम शाला मत रहो यही दुआ कोरता है"

अगली किश्त मे जारी

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पसीना मोबाईल और नोकिया सुंदरी

तीन चार रोज पहले बारिश के बाद का दिन था. मौसम मे आद्रता अपनी उचाईयो पर थी. पसीना लगातार बह रहा था.ऐसे मे अचानक हमारे घूमंतु दूरभाष यंत्र (मोबाईल)ने बिना सूचना के आधी हडताल करदी. यानी काल आ तो रही थी पर उसका काल को स्वीकार करने वाला हरा बटन काम करना छोड चुका था. पूरी जांच पडताल करने पर पता चला भाई ने सीधे सीधे की पैड के आधे बटनो को हडताल मे शामिल कर रखा था.

ऐसे मे हमने सारे काम धाम छोड कर नोकिया के सर्विस सेंटर का पता लगाया और जा पहुचे

नजारा बडा शानदार था, एक चमकते दमकते वातानुकूलित कमरे मे ढेरो लोग जमा थे, हम भी बैठ्ने वालो की लाईन मे बैठ गये.खिसकते खिसकते जैसे ही नंबर आया.  दो कन्याओ ने स्वागत किया, गुड आफ़टर नून सर, यू आर वेलकम इन नोकिया सर्विस सेंटर , मे आई हेल्प यू.

नमस्कार, स्वागत के लिये धन्यवाद, देखिये हमने आपकी कंपनी का मोबाईल अभी कुछ माह पहले ही लिया था , और ये हमे तंग कर रहा है, इसने अचानक कार्य करना बंद कर दिया है कृपया इसे ठीक करादे, चूंकी ये अभी गारंटी मे है हो सके तो इसे बदलवादे.

आप अपना मोबाईल नंबर और नाम बतादे

जी और हमने बता दिया

कृपया बैठिये, हमारा एक्ज्यूकेटिव फ़्री होते ही आपसे बात करेगा

जी हम बैठने नही आये है, हम पहले ही आपके बैठने की जगह का एक घंटे से ज्यादा सदुपयोग कर चुके है.बैठने के लिये इस देश मे अभी भी हमारे पास खुद की व्यक्तीगत जगह बची हुई है. आप कृपया हमारे बीमार मोबाईल को देखने और ठीक कराने का का कष्ट करे तो अति कृपा होगी.

आप मोबाईल से बैटरी सिम कार्ड  फ़ोन मे से डाटा ट्रांसफ़र कर स्टोरेज कार्ड निकाल ले,

जी और हमने बालिका को हैंडसैट थमा दिया ” ये लो सुंदरी”

आपने अभी क्या कहा ?

जी मतलब ?

अभी आपने हैंड सैट मुझे देते वक्त जो शब्द बोले थे , आप एक बार दुबारा बोलेगे

हा हा क्यो नही , मैने कहा था “ये लो सुंदरी ”

आपके सर के सारे बाल सफ़ेद हो गये है, इस उम्र मे आपको बात तक करने की तमीज नही है कि महिलाओ से कैसे बात करते है ?

लेकिन मैने गलत क्या कहा ?

आपने मुझे सुंदरी कैसे कहा ?

बेटा पहली बात तो तुम्हे खुश होना चाहिये कि मैने तुम्हे सुंदर कहा( भले ही इसमे इस शब्द को अपनी तौहीन लगी हो), दूसरी बात अभी अभी मेरे ही सामने तुम्हारे सहकर्मी ने तुम्हे ब्यूटी कह कर पुकारा था, मुझे लगा की तुम शायद इस तरह पुकारे जाने पर प्रसन्न होगी और मेरा काम जल्दी हो जायेगा

वो तो मेरा नाम है .

तो बेटा मैने भी तुम्हे कोई पत्थर थोडे ही मारा है , सिर्फ़ तुम्हे तुम्हारे हिंदी नाम से ही तो पुकारा है , चलो मै अपने शब्द वापिस लेता हू ब्यूटी.

और ब्य़ूटी ने एक दूसरे ब्यूटे को हैंड सैट थमा दिया , उन साहब ने सैट को खोला, एक बडे से आतिशी शीशे से देखा और घोषणा कर दी गारंटी वाईड हो गई है ये पहले ही खुल चुका है.

अब इसके चार्ज लगेगे.

लेकिन जनाब अभी तक तो जब से मैने इसे खरीदा है इसे मेरे अलावा सिर्फ़ आपने ही हाथ लगाया है ये कैसे संभव है कि इसे पहले किसी ने खोला हो ?

आप यहा आकर देखिये मुझे इसके अंदर ये स्क्रैच दिखाई देरहा है.

मेरे भाइ मुझे तो कुछ दिखाई नही दे रहा है ?

आप यहा देखिये

हा मै देख रहा हू

ये इस तरफ़ स्क्रैच है

लेकिन मुझे तो नही दिखा और अगर हो भी तो मुझे कोई लेना देना नही है. आपकी कंपनी को सील लगानी चाहिये थी. देखिये वो लगी हुई है

देखिये इसको टेम्पर्ड किया गया है.इसलिये ये अब वारंटी से बाहर है.

मैने तुरंत उनके मालिक को बुलाया

मेरे भाइ जब आपने इसे बेचा था तब आप इसे खोल कर ग्राहक को दिखाते है क्या कि यहा कोई स्क्रैच अगर दिखाई दी तो हम वारंटी वापिस ले लेगे ? ये मैने आपके यहा सेही लिया था और मुझे लग रहा है कि आपने मुझे रिपेयर सैट बेच दिया था ? ठीक है आप इसे वापस दे दे. मै अब नोकिया से ही बात करूंगा और आईंदा आपसे कोई वस्तू नही खरीदूंगा.

मालिक ने तुरंत अपने कर्मचारी को समझाया ,बेटा ये अपने खास आदमी है करदे , ” हो जायेगा जी अरोडा साहब , आपको मेरे पास आना चाहिये था , आप नाराज नाहो’

अब उस ब्यूटे ने अगला काम शुरू किया , हैड सैट की सारी अंतडिया बाहर निकाली और सूघंनी शुरू की , मुझे लगा की नोकिया ने कुत्तो का काम भी इन्सानो से कराना शुरू कर दिया है.अब तक मै यही समझता था कि इलेक्ट्रिनिक्स के सामान कुछ मशीनो की सहायता से ठीक होते है.चलिये मेरे ज्ञान मे वृद्दी हुई, ये नोकिया ने कुछ नया तरीका इजाद किया हुआ होगा.

अचानक ब्य़ूटे ने घोषणा की साहब इसमे लिक्विड मैटेरियल अंदर गया है, गारंटी वोईड हो गई है.

मेरे भाइ ये तुम क्या बता रहे हो ? मैने तो आते ही आपको सूचित किया था कि इसमे बात करते हुये गाल से बह रहा पसीना अंदर चला गया है, इसके पैड की रबर लाईनिंग ठीक नही थी, ये मनुफ़ैक्चरिंग डिफ़ेक्ट है,

नही जी नोकिया इस हाल मे कोई जिम्मेदारी नही लेता, आप बताये आप को हैंड सैट ठीक कराना है या नही?

ठीक है भाई करदो, अब इतने महंगे डिब्बे को रखने का तो कोई मतलब नही है ना

और साहब ५०० रूपये की चोट लग गई, लेकिन मोबाईल के अभी  भी काल रीसीव करने वाला बटन काम नही कर रहा, बताया गया है कि इसके लिये इसे कंपनी भेजा जायेगा जहा ठीक होने मे हफ़्ता दस दिन लगेगे, इसके लिये कंपनी कोई खेद व्यक्त नही करती , आप चाहे तो इसे फ़ेक कर दूसरा भी ले सकते है. लेकिन इस बीच मे मैने पता किया कि वहा आये सारे बंदे इसी बिमारी के थे यानी सबकी वारंटी वाईड ही थी.फ़िलहाल मेरा मोबाईल मेरे पास है और मेरी नोकिया वालो से बातचीत जारी है कि पसीना की पैड के अंदर जाने से रोकना नोकिया के क्षेत्र मे आता है या मेरे और क्या ये ठीक हो पायेगा . वैसे नोकिया केयर वालो का भी यही कहना है जो उनके सर्विस सेंटर का है.शायद भारत मे ही ये लोग ऐसा कर पाते है.क्योकी हम लोग ग्राहक सेवा नियमो के अधीन इन लोगो पर कोई केस वगैरा करने से बचते रहते है .

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